कोई लौटा दे वो नोटबन्दी वाले दिन ......

Monday, April 03, 2017
   तुम्हें याद हो कि न याद हो, उस दिन हम दिल्ली से सफ़र करके थक के चूर हो गए थे l पूरे देश में अफरा – तफरी और हड़बड़ी मची हुई थी l पांच सौ और हजार के नोट न हो गए हों, कोई घर का कबाड़ हो जिसे हम जल्दी से कबाड़ी को दे देना चाहते हों l
   याद है, लेकिन हम सुकून में थे. कोई जल्दबाजी नहीं, कोई घबराहट नहीं l घर के जो भी छुटपुट रुपए थे जिन्हें हमें बैंक में जमा करना था l लोगों ने बैंक की क़तारें चुनी थीं लेकिन हमने कैश डिपोजिट मशीन l मम्मी ने भी हम दोनों को दूध का डिब्बा थमा दिया था, नोट रखने के लिए l डरते – डरते रिक्शा किया, रात का समय था तो डर और बढ़ गया था l रिक्शे पे मेरे दाईं तरफ तुम बैठी थी l हम दोनों के बीच में था वो डिब्बा जिसमें हम नोट ले जा रहे थे l कितना शान्त थी न तुम , कभी तुम मुझे देखती और कभी मैं तुम्हें देख लेता l कुछ नहीं तो हम दोनों आसमान को देख लेते l
   सी डी एम पहुँचे एटीएम लगाया नोट खट से जमा हो गए l मारे ख़ुशी के उछल पड़े l भीड़ ने हमें देखा, लेकिन हमने एक दूसरे को देखा l घर पहुँचने की जल्दी थी, दोबारा नोट जो लाने थे घर से l
   घर पहुँच कर फिर उसी डिब्बे में नोट लिए और मॉल रोड के लिए रिक्शा कर लिया l सी डी एम पहुँचे तब तक मशीन ख़राब हो चुकी थी और हम मायूस हो गए थे l उस एस. बी.आई. ई.- पॉइंट से बाहर आये तो आईसक्रीम वाला दिख गया, मैंने उसे दो बटर स्कॉच देने को कह दिया l तुमने डपटते हुए कहा “पागल हो क्या? नोटबन्दी में दो आईसक्रीम खायेंगे” l हमने एक ही आईसक्रीम ले ली l रास्ते भर ठंडी में आईसक्रीम खाते रहे l
   अगले दिन फिर यही सिलसिला शुरू किया कभी एस.बी.आई. कभी आई.सी.आई.सी.आई. , कभी बी. ओ. आई. , कहीं कुछ एक नोट जमा हो जाते , फिर दूसरा कॉर्नर तलाशते फिर मायूस हो जाते l जहाँ कुछ नोट जमा हो जाते तो हमारे चेहरे पे विजयी मुस्कान आ जाती l हम उसे नोट जमा होने की ख़ुशी ही समझते रहे , लेकिन जीते रहे l मज़ा आने लगा था रम से गए थे उन दिनों की दुनिया में l पता नहीं कौन सी खुमारी आ गई थी l नोट तो ख़त्म होने थे हो गए l लेकिन शायद वो प्यार वाले दिन चले गए l सुनसान सड़कें और बैंक की भीड़ हमें अच्छी लगने लगी थी l साथ – साथ चलने लगे थे न हम दोनों l पैसे जमा होने की ख़ुशी तो थी ही लेकिन उन दिनों का जल्दी बीत जाने का दुःख ज्यादा था l
  शायद प्यार की टूटन थी , जो कि हम नहीं चाहते थे l आज एक डायरी में उस आईसक्रीम वाले का रेपर देखा तो याद आ गई उन दिनों की l अब ये नोटबन्दी की याद थी या तुम्हारी पता नहीं l तुम्हें भी तो आई ही होगी l तुमने बताया नहीं कभी l अबकि बार मिलोगी तो बताना जरूर l मैं तो कहता हूँ , प्रधानमंत्री जी को चिट्ठी लिख देते हैं और फिर से नोटबन्दी करा देते हैं l हम प्यार को दोबारा जी लेंगे l इसी बहाने शायद हमारे घर वालों को पता चल जाए और शादी को राजी हो जाएँ l पता है तुम्हें मैं तो अब अक्सर गुनगुनाता रहता हूँ l कोई लौटा दे नोटबन्दी वाले दिन ......

शाहिद अजनबी    

       20.03.2017    03:00 am 

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